
श्री गणेश जी की आरती
एकदन्त, दयावन्त, चार भुजाधारी,
माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी।
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।।
॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा… ॥
माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी।
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।।
॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा… ॥
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।
हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन को भोग लगे, सन्त करें सेवा।।
॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा… ॥
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।
हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन को भोग लगे, सन्त करें सेवा।।
॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा… ॥
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी,
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी।
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा,
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा… ॥
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी।
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा,
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा… ॥
